माफ़ करने की जगह आपको माफ़ी मांगनी चाहिए थी मोदी जी
आधी रात को प्रधानमंत्री की रील का मतलब क्या है?
प्रधानमंत्री से उम्मीद की जाती है कि वे संसद में बोलें, वहाँ रहें तथा उठ रहे सवालों के जवाब दें लेकिन मज़ेदार है कि लोकसभा/राज्यसभा पहुँचने में असमर्थ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आधी रात को सोशल मीडिया पर रीलें पोस्ट कर रहे हैं। शायद उन्हें बताया गया है कि लोग आजकल किताबें पढ़ने या परिवार को समय देने की जगह आधी रात में रीलें देखते हैं तो उस समय उनकी बात मोबाइल फ़ीड में पहुँचने की संभावना ज़्यादा रहेगी।
वह प्रधानमंत्री हैं, उनकी कही बात चाहे जिस प्लेटफ़ॉर्म पर हो, देश और दुनिया में सुनी ही जाएगी तो व्यूज आने तय हैं, लेकिन यह हास्यास्पद है कि पहली रील के बाद व्यूज को भी सेलीब्रेट किया गया!
कल देर रात जारी
वीडियो में प्रधानमंत्री ने पहले तो खुद को गाली देने पर दुख जताया, अपनी माताजी को भी याद किया और उसके बाद ‘बच्चों को’ माफ़ कर दिया। ज़ाहिर है सोशल मीडिया ‘अहो-अहो’ से भर गया। बड़े दिल की तारीफ़ की गई और सोशल मीडिया चिर-परिचित चापलूसी से भर गया।
पूरे घटनाक्रम को देखिए तो दो सवाल उठते हैं।
पहला यह कि आखिर इन युवाओं, जिन्हें बच्चे कहकर मामले को हल्का किया जा रहा है, उन्हें परेशान कौन कर रहा था? कौन उनकी निजी जानकारियाँ लीक कर रहा था? कौन उन्हें ट्रॉल कर रहा था? कौन उनके खिलाफ़ एफ आई आर कर रहा था? ये सब तो वही लोग थे जो सत्ता समर्थक हैं। एफ आई आर भाजपा के लोगों द्वारा करवाए गए थे। सरकार समर्थक माने जाने वाला कथित नेशनल मीडिया उनकी तस्वीरें प्रदर्शित कर रहा था। फिर प्रधानमंत्री सीधे उनसे यह बात क्यों नहीं कह सकते थे? या फिर यही बात संसद में क्यों नहीं कही जा सकती थी? एक पंद्रह साल की बच्ची को इतना परेशान किया गया कि उसने सार्वजनिक माफी का वीडियो जारी किया। यह राष्ट्रीय शर्म की बात थी। प्रधानमंत्री का वीडियो उसके बाद आया और इसीलिए वह माफी कम लग रहा था, धमकी ज़्यादा।
दूसरा सवाल यह कि जब पुलिसकर्मियों के परिवारों का इंटरव्यू करवाया जा रहा है तो क्या यह पुलिस द्वारा छात्रों/युवाओं के बर्बर दमन को छिपाए जाने का खेल नहीं है? क्या उन युवाओं के परिवारों के इंटरव्यू चलाए गए इस मीडिया पर जो पुलिस की लाठियों और पैलट गन के शिकार हुए? पैलट गन से लेकर पत्थरों से भरे ट्रक पर पुलिस की उलबाँसियाँ जब सामने आ चुकी हैं तो माफी तो सरकार को माँगनी चाहिए थी जिसके मुखिया नरेंद्र मोदी हैं। संसद में होने के बावजूद गृहमंत्री अमित शाह अगर नेता विपक्ष के इस सवाल का जवाब देने के लिए लोकसभा में नहीं आए कि आखिर पैलट गन और लाठीचार्ज की इजाज़त किसने दी थी, तो माफ़ी इसके लिए मांगी जानी चाहिए थी।
- माफ़ी मांगी जानी चाहिए थी इन युवाओं से लगातार पेपर लीक के लिए। हालात ऐसे हैं कि इस आन्दोलन के बाद भी गुजरात और असम से पेपर लीक की घटनाएं सामने आई हैं।
- माफ़ी मांगी जानी चाहिए थी उन छात्र-छात्राओं के परिवारों से जिन्होंने पेपर लीक की वजह से आत्महत्या कर ली।
- माफ़ी मांगी जानी चाहिए थी हर साल दो करोड़ रोज़गार देने का वादा पूरा न कर पाने के लिए।
- माफ़ी मांगी जानी चाहिए थी राम मंदिर में जनता के चढ़ावे की लूट के लिए।
- माफ़ी देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू और महात्मा गांधी के चरित्र हनन के लिए भी मांगी जानी चाहिए थी।
- माफ़ी तो बुलडोज़रों के लिए भी मांगी जानी चाहिए थी।
असल में, युवाओं के इस आन्दोलन से सरकार घबराई हुई है। भले इसकी शुरुआत नीट पेपर लीक की वजह से हुई, इसकी जड़ में युवाओं और देश में वह हताशा और निराशा है जो पिछले 11 साल में सरकारी नीतियों के चलते पैदा हुई है। बेरोज़गारी, मंहगाई और विकास के नाम पर खुली लूट तथा भ्रष्टाचार को आई टी सेल और दोस्त मीडिया के सहारे दबाने के लिए हिन्दू-मुसलमान के नैरेटिव ने लोगों को थका डिया है। जितने सपने दिखाए गए थे विकसित भारत के सब बिखर रहे हैं। दुनिया में डंका बजने के जितने नैरेटिव चलाए गए थे, उनका खोखलापन सामने आ चुका है।
किसी भी सभ्य समाज में गालियों की जगह नहीं होनी चाहिए, लेकिन 2014 के बाद सोशल मीडिया पर गालियों का जो दौर चला, उसे चलाने वाले कौन थे? गौरी लंकेश की हत्या के बाद उन्हें गालियों से नवाज़ने वालों को आखिर प्रधानमंत्री क्यों फॉलो करते रहे ट्विटर पर? संसद के अंदर जब एक मुस्लिम सांसद को गालियाँ दी गईं तो प्रधानमंत्री क्यों खामोश रहे? प्रधानमंत्री की स्वर्गीय माँ सम्माननीय हैं, लेकिन क्या सरकार से सवाल पूछने वालों की माएं, बहनें, पत्नियाँ सम्माननीय नहीं हैं, जिन्हें गाली देने वालों पर कभी कोई कार्यवाही नहीं हुई? क्या स्वर्गीय पंडित नेहरू सम्माननीय नहीं हैं जिनके लिए संसद में भाजपा के एक सदस्य ने अपमानजनक शब्द उपयोग किया?
इन सवालों के जवाब जनता मांग रही है अब। पुलिस के डर से लोग नहीं बोलेंगे। मीडिया सब चंगा सी का भ्रम बना देगा। सरकारी अधिकारी आन्दोलन के बेअसर होने की रिपोर्ट दे देंगे। जंतर-मंतर पर कान्क्रीट लग जाएगा। सब हो जाएगा, लेकिन इतिहास बताता है कि आन्दोलन स्थल से युवा अपने सीने में एक जंतर-मंतर ले जाते हैं और उसकी आंच वर्षों नहीं बुझती।
काश इस सच को समझ कर माफ़ करने की जगह आप देश के युवाओं से माफ़ी मांग लेते मोदी जी!